Brahmin The Great
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Publisher: Indra Publishing House
-
Language: Hindi
-
Pages: 250
-
Cover: Paperback
-
Dimensions: 20.32 x 12.7 x 1.44 cm
-
Weight: 190 g
-
ISBN: 9789393577580
About the Book
शुभेन्द्र, एक युवा ब्राह्मण जो अमेरिका की एक बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनी में सीईओ के प्रतिष्ठित पद पर कार्यरत था, अपनी ऐश्वर्यपूर्ण और सुविधाओं से भरी जीवनशैली के बावजूद भीतर से अधूरा महसूस करता था। लेकिन एक दिन उसके हाथ चाणक्य की जीवनी लगी, जिसने उसकी पूरी दृष्टि, भावनाएँ और जीवन का मार्ग ही बदल दिया। प्राचीन भारत में ब्राह्मणों की गौरवमयी स्थिति जानकर जहाँ उसके भीतर गर्व की नई ज्योति जल उठी, वहीं उनकी वर्तमान दयनीय अवस्था देखकर उसका हृदय करुणा से भर उठा। ब्राह्मण गौरव की पुनर्स्थापना का विचार उसके मन में धुन की तरह सवार हो गया और धीरे-धीरे यह धुन एक अटूट संकल्प में बदल गई।
अंततः शुभेन्द्र ने एक कठिन और साहसी निर्णय लिया—अपने उच्च पद, परिवार, सुख-सुविधाओं और अमेरिकी जीवन को त्यागकर वह भारत लौट आया। यहाँ आकर उसने अपना सिर मुंडवाया, शिखा और जनेऊ धारण किए, पेंट-शर्ट उतारकर धोती पहन ली और पैरों में लकड़ी की खड़ाऊँ डाल लीं। कंधे पर झोला लटकाए, वह मानो स्वयं चाणक्य कौटिल्य के पुनरागमन का प्रतीक बन गया था। यह झोला उसके ब्राह्मण समुदाय के प्रति उत्तरदायित्व का चिह्न बन गया।
अब उसका जीवन केवल एक लक्ष्य के इर्द-गिर्द घूमता है—ब्राह्मणों के प्राचीन गौरव को पुनः स्थापित करना, उन्हें फिर से ज्ञान के उस शिखर पर पहुँचाना, जहाँ से वे कभी संपूर्ण विश्व को वेदों का महान प्रकाश प्रदान करते थे। इस पवित्र उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसने पैदल ही पूरे भारत का भ्रमण करने का निश्चय किया—ताकि वह सोए हुए ब्राह्मणत्व को फिर से जगाए और समाज में नई चेतना का संचार करे।
क्या शुभेन्द्र इस महान और पावन लक्ष्य में सफल हो पाएगा? यही प्रश्न पुस्तक के प्रत्येक पृष्ठ को जीवंतता, प्रेरणा और जिज्ञासा से भर देता है।
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Brahmin The Great
Brahmin The Great
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Publisher: Indra Publishing House
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Language: Hindi
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Pages: 250
-
Cover: Paperback
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Dimensions: 20.32 x 12.7 x 1.44 cm
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Weight: 190 g
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ISBN: 9789393577580
About the Book
शुभेन्द्र, एक युवा ब्राह्मण जो अमेरिका की एक बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनी में सीईओ के प्रतिष्ठित पद पर कार्यरत था, अपनी ऐश्वर्यपूर्ण और सुविधाओं से भरी जीवनशैली के बावजूद भीतर से अधूरा महसूस करता था। लेकिन एक दिन उसके हाथ चाणक्य की जीवनी लगी, जिसने उसकी पूरी दृष्टि, भावनाएँ और जीवन का मार्ग ही बदल दिया। प्राचीन भारत में ब्राह्मणों की गौरवमयी स्थिति जानकर जहाँ उसके भीतर गर्व की नई ज्योति जल उठी, वहीं उनकी वर्तमान दयनीय अवस्था देखकर उसका हृदय करुणा से भर उठा। ब्राह्मण गौरव की पुनर्स्थापना का विचार उसके मन में धुन की तरह सवार हो गया और धीरे-धीरे यह धुन एक अटूट संकल्प में बदल गई।
अंततः शुभेन्द्र ने एक कठिन और साहसी निर्णय लिया—अपने उच्च पद, परिवार, सुख-सुविधाओं और अमेरिकी जीवन को त्यागकर वह भारत लौट आया। यहाँ आकर उसने अपना सिर मुंडवाया, शिखा और जनेऊ धारण किए, पेंट-शर्ट उतारकर धोती पहन ली और पैरों में लकड़ी की खड़ाऊँ डाल लीं। कंधे पर झोला लटकाए, वह मानो स्वयं चाणक्य कौटिल्य के पुनरागमन का प्रतीक बन गया था। यह झोला उसके ब्राह्मण समुदाय के प्रति उत्तरदायित्व का चिह्न बन गया।
अब उसका जीवन केवल एक लक्ष्य के इर्द-गिर्द घूमता है—ब्राह्मणों के प्राचीन गौरव को पुनः स्थापित करना, उन्हें फिर से ज्ञान के उस शिखर पर पहुँचाना, जहाँ से वे कभी संपूर्ण विश्व को वेदों का महान प्रकाश प्रदान करते थे। इस पवित्र उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसने पैदल ही पूरे भारत का भ्रमण करने का निश्चय किया—ताकि वह सोए हुए ब्राह्मणत्व को फिर से जगाए और समाज में नई चेतना का संचार करे।
क्या शुभेन्द्र इस महान और पावन लक्ष्य में सफल हो पाएगा? यही प्रश्न पुस्तक के प्रत्येक पृष्ठ को जीवंतता, प्रेरणा और जिज्ञासा से भर देता है।
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Description
-
Publisher: Indra Publishing House
-
Language: Hindi
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Pages: 250
-
Cover: Paperback
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Dimensions: 20.32 x 12.7 x 1.44 cm
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Weight: 190 g
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ISBN: 9789393577580
About the Book
शुभेन्द्र, एक युवा ब्राह्मण जो अमेरिका की एक बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनी में सीईओ के प्रतिष्ठित पद पर कार्यरत था, अपनी ऐश्वर्यपूर्ण और सुविधाओं से भरी जीवनशैली के बावजूद भीतर से अधूरा महसूस करता था। लेकिन एक दिन उसके हाथ चाणक्य की जीवनी लगी, जिसने उसकी पूरी दृष्टि, भावनाएँ और जीवन का मार्ग ही बदल दिया। प्राचीन भारत में ब्राह्मणों की गौरवमयी स्थिति जानकर जहाँ उसके भीतर गर्व की नई ज्योति जल उठी, वहीं उनकी वर्तमान दयनीय अवस्था देखकर उसका हृदय करुणा से भर उठा। ब्राह्मण गौरव की पुनर्स्थापना का विचार उसके मन में धुन की तरह सवार हो गया और धीरे-धीरे यह धुन एक अटूट संकल्प में बदल गई।
अंततः शुभेन्द्र ने एक कठिन और साहसी निर्णय लिया—अपने उच्च पद, परिवार, सुख-सुविधाओं और अमेरिकी जीवन को त्यागकर वह भारत लौट आया। यहाँ आकर उसने अपना सिर मुंडवाया, शिखा और जनेऊ धारण किए, पेंट-शर्ट उतारकर धोती पहन ली और पैरों में लकड़ी की खड़ाऊँ डाल लीं। कंधे पर झोला लटकाए, वह मानो स्वयं चाणक्य कौटिल्य के पुनरागमन का प्रतीक बन गया था। यह झोला उसके ब्राह्मण समुदाय के प्रति उत्तरदायित्व का चिह्न बन गया।
अब उसका जीवन केवल एक लक्ष्य के इर्द-गिर्द घूमता है—ब्राह्मणों के प्राचीन गौरव को पुनः स्थापित करना, उन्हें फिर से ज्ञान के उस शिखर पर पहुँचाना, जहाँ से वे कभी संपूर्ण विश्व को वेदों का महान प्रकाश प्रदान करते थे। इस पवित्र उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसने पैदल ही पूरे भारत का भ्रमण करने का निश्चय किया—ताकि वह सोए हुए ब्राह्मणत्व को फिर से जगाए और समाज में नई चेतना का संचार करे।
क्या शुभेन्द्र इस महान और पावन लक्ष्य में सफल हो पाएगा? यही प्रश्न पुस्तक के प्रत्येक पृष्ठ को जीवंतता, प्रेरणा और जिज्ञासा से भर देता है।














